शायद मैं ज़िंदगी की सहर ले के आ गया
क़ातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया,
ता उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की
अंजाम ये कि गर्द ए सफ़र ले के आ गया,
नश्तर है मेरे हाथ में काँधों पे मयकदा
लो मैं इलाज ए दर्द ए जिगर ले के आ गया,
फ़ाकिर सनम कदे में न आता मैं लौट कर
एक ज़ख़्म भर गया था इधर ले के आ गया..!!
~सुदर्शन फ़ाकिर
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