यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे

यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे
साथ चल मौज ए सबा हो जैसे,

लोग यूँ देख के हँस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे,

इश्क़ को शिर्क की हद तक न बढ़ा
यूँ न मिल हम से ख़ुदा हो जैसे,

मौत भी आई तो इस नाज़ के साथ
मुझ पे एहसान किया हो जैसे,

ऐसे अंजान बने बैठे हो
तुम को कुछ भी न पता हो जैसे,

हिचकियाँ रात को आती ही रहीं
तू ने फिर याद किया हो जैसे,

ज़िंदगी बीत रही है दानिश
एक बे जुर्म सज़ा हो जैसे..!!

~एहसान दानिश

न सियो होंठ न ख़्वाबों में सदा दो हम को

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1 thought on “यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे”

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