शब ए हिज्राँ की तवालत से घबरा गया हूँ मैं

शब ए हिज्राँ की तवालत से घबरा गया हूँ मैं
उसके अंदाज़ ए मुहब्बत से घबरा गया हूँ मैं,

तू सराब ही सही मगर नज़र तो आ मुझको
कि प्यास की शिद्दत से घबरा गया हूँ मैं,

खिज़ां की तल्खियाँ सहने को तन्हा पत्ते छोड़ गए शज़र को
अपनों की ऐसी ही हालत से घबरा गया हूँ मैं,

कोई पहचान न सकेगा किसी को बरोज़ ए हश्र
तेरे बाद तसव्वुर ए क़यामत से घबरा गया हूँ मैं,

ख़ुदकुशी तो किसी मसले का हल नहीं है नवाब
ये और बात कि खलुत से घबरा गया हूँ मैं..!!


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