सरबुरीदा कोई लश्कर नहीं देखा जाता

सरबुरीदा कोई लश्कर नहीं देखा जाता
हम से ये ज़ुल्म का मंज़र नहीं देखा जाता,

अपनी आँखों को यही कह के सुला देता हूँ
अपनी औक़ात से बढ़ कर नहीं देखा जाता,

अपने काँधों पे उठा लेते हैं लाशा अपना
बोझ अपना किसी सर पर नहीं देखा जाता,

देखने को तो उसे बार नहीं है मुझ को
बात ये है कि बराबर नहीं देखा जाता,

लौटना हो तो उन आँखों से किनारा कर लो
डूबना हो तो समुंदर नहीं देखा जाता,

आइना हूँ न चुरा मुझ से तू नज़रें अपनी
देख आईने से बाहर नहीं देखा जाता,

हम बुरे हैं तो कोई बात नहीं है इक़रार
उन से तो कोई सुख़नवर नहीं देखा जाता..!!

~इक़रार मुस्तफ़ा

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