क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना…

क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना
तअ’ज्जुब से वो बोला यूँ भी होता है ज़माने में,

दिल-ए-नाज़ुक पे उस के रहम आता है मुझे ‘ग़ालिब’
न कर सरगर्म उस काफ़िर को उल्फ़त आज़माने में..!!

~मिर्ज़ा ग़ालिब


Discover more from Hindi Gazals :: हिंदी ग़ज़लें - A Huge collection of Hindi/Urdu Ghazals :: हिंदी/उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply