लहरा के झूम झूम के ला मुस्कुरा के ला
फूलों के रस में चाँद की किरनें मिला के ला,
कहते हैं उम्र ए रफ़्ता कभी लौटती नहीं
जा मय कदे से मेरी जवानी उठा के ला,
साग़र शिकन है शैख़ ए बला नोश की नज़र
शीशे को ज़ेर ए दामन ए रंगीं छुपा के ला,
क्यूँ जा रही है रूठ के रंगीनी ए बहार
जा एक मर्तबा उसे फिर वर्ग़ला के ला,
देखी नहीं है तू ने कभी ज़िंदगी की लहर
अच्छा तो जा अदम की सुराही उठा के ला..!!
~अब्दुल हमीद अदम
मेरे ही लहू पर गुज़र औक़ात करो हो
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