कितनी तरकीबें कीं बातिन के लिए

कितनी तरकीबें कीं बातिन के लिए
नून साकिन मीम साकिन के लिए,

मेरे अपने मुझ से जब बरहम हुए
मैं रहूँ ज़िंदा भला किन के लिए ?

या ख़ुदा उस के सभी ग़म दूर हो
मैं दुआ करती हूँ मोहसिन के लिए,

पूछते हो हम से है इस्लाम क्या
हक़ पे चलना फ़र्ज़ मोमिन के लिए,

गर्दिश ए अय्याम ने तोड़े सितम
वक़्त ने बदले भी गिन गिन के लिए,

बिजलियों ने फिर जलाया आशियाँ
मैं ने फिर से चोंच में तिनके लिए,

ऐन मुमकिन है मिटा दूँ मसअले
बस परेशानी है लेकिन के लिए,

उन को मुझ से वास्ता कुछ भी नहीं
ख़ाक कर दी ज़िंदगी जिन के लिए,

आज के इस दौर में जीना सज़ा
जाने क्यों ज़िंदा हैं किस दिन के लिए ?

इस जहाँ में कुछ भी हो सकता है अब
हैं खुले दर ग़ैर मुमकिन के लिए,

इन सवालों पर मेरे वो चुप रहा
थी मुझे उम्मीद जिन जिन के लिए,

उम्र भर शहनाज़ उम्मीद ए सहर
मेरा सूरज छुप गया दिन के लिए,

जिन पे हम मरते रहे शहनाज़ वो
कहते हैं ज़िंदा हो किस दिन के लिए..!!

~शहनाज़ रहमत

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