बड़ा बेशर्म ज़ालिम है, बड़ी बेहिस फ़ितरत है
उसको कहाँ पता हया क्या ? क्या शराफ़त है,
हमें तो ज़ुल्म सहने के लिए भेजा गया शायद
जहाँ देखो वहाँ पे मुल्क में ग़ुर्बत है मुसीबत है,
ऐसा बाज़ार बना डाला जहाँ हर चीज बिकती है
यहाँ अद्ल बिकता है कि रक्कासा अदालत है,
ये मुल्क ए हिन्दुस्तान यकज़हती की निशानी था
रहा करते है हम जिसमे वहाँ वहशत ही वहशत है,
तरक्क़ी तो ज़रा देखो, मिले आटा भी कतारों में
मगर दावा मुसलसल ये कमज़र्फों की फ़ितरत है,
जहाँ माँ बाप बच्चे बेचने पर हुए है आज आमादा
नहीं मालूम ऐसा मुल्क ये दोज़ख है कि जन्नत है ?
भले महँगाई का तूफ़ान आया है, सो आया है
जफ़ा सहते है हँस हँस कर सितम सहने की आदत है,
ग़रीबी ले के जो हुए पैदा तो कैसा हक़ है जीने का
तुम्हे बे वक़्त ही मरना पड़ेगा यही जीने की क़ीमत है,
बड़ी तनक़ीद करते फिर रहे है लोग हुक्मरानों पर
इन्हें एहसास भी कुछ है, इनकी क्या हकीक़त है,
गरीबो को मिटाने पर है कब से मुस्तैद हाकिम ए वक़्त
मगर कैसे अभी तक ज़िन्दा है हम सब हमको हैरत है,
पिदर ए बुजुर्ग ने ला के बच्चों को समन्दर में डुबो डाला
अगर अमीर ए शहर को एहसास हो तो ये क़यामत है,
लूट कर जमा किया दौलत ए मुल्क जो गैर मुल्कों में
उसे वापस ले के आएँ उनमे थोड़ी सी भी जो गैरत है,
सितम इतना ही रवा रखना कि जो बर्दाश्त कर पाओ
कभी तो मज़लूम जागेगा, अरे उसकी भी तो इज्ज़त है,
अभी इफ़लास का रक्कास महव ए रक्स आँगन में
कभी हमारे दिन भी ख़ुशहाली के आएँगे ये हसरत है..!!
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