कभी तो ऐसा भी हो राह भूल जाऊँ मैं

कभी तो ऐसा भी हो राह भूल जाऊँ मैं
निकल के घर से न फिर अपने घर में आऊँ मैं,

बिखेर दे मुझे चारों तरफ़ ख़लाओं में
कुछ इस तरह से अलग कर कि जुड़ न पाऊँ मैं,

ये जो अकेले में परछाइयाँ सी बनती हैं
बिखर ही जाएँगी लेकिन किसे दिखाऊँ मैं ?

मेरा मकान अगर बीच में न आए तो
इन ऊँचे ऊँचे मकानों को फाँद जाऊँ मैं,

गवाही देता वही मेरी बे गुनाही की
वो मर गया तो उसे अब कहाँ से लाऊँ मैं ?

ये ज़िंदगी तो कहीं ख़त्म ही नहीं होती
अब और कितने दिनों ये अज़ाब उठाऊँ मैं ?

ग़ज़ल कही है कोई भाँग तो नहीं पी है
मुशाएरे में तरन्नुम से क्यूँ सुनाऊँ मैं ?

अरे वो आप के दीवान क्या हुए अल्वी
बिके न हों तो कबाड़ी को साथ लाऊँ मैं..!!

~मोहम्मद अल्वी

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