इस ख़ाकदाँ में अब तक बाक़ी हैं कुछ शरर से
दामन बचा के गुज़रो यादों की रहगुज़र से,
हर हर क़दम पे आँखें थीं फ़र्श ए राह लेकिन
वो रौशनी का हाला उतरा न बाम पर से,
क्यूँ जादा ए वफ़ा पर मिशअल ब कफ़ खड़े हो
इस सैल ए तीरगी में निकलेगा कौन घर से ?
किस दश्त की सदा हो इतना मुझे बता दो
हर सू बिछे हैं रस्ते आऊँ तो मैं किधर से,
उजड़ा हुआ मकाँ है ये दिल जहाँ पे हर शब
परछाइयाँ लिपट कर रोती हैं बाम ओ दर से..!!
~शकेब जलाली

























