हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह,
इस कू ए तिश्नगी में बहुत है कि एक जाम
हाथ आ गया है दौलत ए बेदार की तरह,
वो तो कहीं है और मगर दिल के आस पास
फिरती है कोई शय निगह ए यार की तरह,
सीधी है राह ए शौक़ पे यूँही कहीं कहीं
ख़म हो गई है गेसू ए दिलदार की तरह,
बे तेशा ए नज़र न चलो राह ए रफ़्तगाँ
हर नक़्श ए पा बुलंद है दीवार की तरह,
अब जा के कुछ खुला हुनर ए नाख़ुन ए जुनूँ
ज़ख़्म ए जिगर हुए लब ओ रुख़्सार की तरह,
मजरूह लिख रहे हैं वो अहल ए वफ़ा का नाम
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं
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