दर्द ए दिल के कम होने का तन्हा कुछ सामान हुआ
हम भी अब कुछ दिन जी लेंगे इसका भी इम्कान हुआ,
एक दीये की लौ ने सारा शहर जला कर खाक़ किया
एक हवा का झोंका बन कर आँधी और तूफान हुआ,
आरज़ूओ की नीची साँस ने इस दर पे दस्तक दी
और जूनूं का एक एक लम्हा मेरे घर का मेहमान हुआ,
वक़्त का काटना उससे पूछो हिज़्र में जिसकी गुज़री हो
एक एक लम्हा एक सदी था कब हम पर आसान हुआ,
कोई किसी का मीत नहीं है दुनियाँ कहती आई है
हमने जिसको अपना जाना वक़्त पे वो भी अंजान हुआ,
इश्क़ उड़ानों का दुश्मन है क्या उसको मालूम न था
दिल का पंछी क़ैद में आ कर क्यों इतना हैरान हुआ ?
तन्हा उनकी गुल अफशानी कुछ ना पूछो कैसे है ?
जब भी हज़रत वाएज़ बोले सब का जी हलकान हुआ..!!
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