हर सू जहाँ में शाम ओ सहर ढूँढते हैं हम

हर सू जहाँ में शाम ओ सहर ढूँढते हैं हम
जो दिल में घर करे वो नज़र ढूँढते हैं हम,

इन बस्तियों को फूँक के ख़ुद अपने हाथ से
अपने नगर में अपना वो घर ढूँढते हैं हम,

जुज़ रेगज़ार कुछ भी नहीं ता हद निगाह
सहरा में सायादार शजर ढूँढते हैं हम,

तस्लीम है कि जुड़ता नहीं है शिकस्ता दिल
फिर भी दुकान ए आईनागर ढूँढते हैं हम,

जिस की अदा अदा पे हो इंसानियत को नाज़
मिल जाए काश ऐसा बशर ढूँढते हैं हम,

कुछ इम्तियाज़ ए मज़हब ओ मिल्लत नहीं हमें
एक मोतबर रफ़ीक़ ए सफ़र ढूँढते हैं हम,

इस दौर में जो फ़न को हमारे परख सके
वो साहब ए ज़बान ओ नज़र ढूँढते हैं हम,

हाथ आएगा न कुछ भी ब जुज़ संग ए बेबिसात
उथले समुंदरों में गुहर ढूँढते हैं हम,

आजिज़ तलाश ए शम्अ में परवाने महव हैं
हैरत उन्हें है उन को अगर ढूँढते हैं हम..!!

~आजिज़ मातवी

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