ग़ालिब ओ यगाना से लोग भी थे जब तन्हा
हम से तय न होगी क्या मंज़िल ए अदब तन्हा,
फ़िक्र ए अंजुमन किस को कैसी अंजुमन प्यारे
अपना अपना ग़म सब का सोचिए तो सब तन्हा,
सुन रखो ज़माने की कल ज़बान पर होगी
हम जो बात करते हैं आज ज़ेर ए लब तन्हा,
अपनी रहनुमाई में की है ज़िंदगी हम ने
साथ कौन था पहले हो गए जो अब तन्हा,
मेहर ओ माह की सूरत मुस्कुरा के गुज़रे हैं
ख़ाक दान ए तीरा से हम भी रोज़ ओ शब तन्हा,
कितने लोग आ बैठे पास मेहरबाँ हो कर
हम ने ख़ुद को पाया है थोड़ी देर जब तन्हा,
याद भी है साथ उन की और ग़म ए ज़माना भी
ज़िंदगी में ऐ जालिब हम हुए हैं कब तन्हा..??
~हबीब जालिब
सर ए मिंबर वो ख़्वाबों के महल तामीर करते हैं
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