डूबता साफ़ नज़र आया किनारा कोई दोस्त

डूबता साफ़ नज़र आया किनारा कोई दोस्त
फिर भी कश्ती से नहीं हम ने उतारा कोई दोस्त,

जब भी नेकी का कोई काम किया है हम ने
दे दिया रब ने हमें आप से प्यारा कोई दोस्त,

जीत पर ख़ुश हो तुझे इस से ग़रज़ क्या मेरे यार
तेरी ख़ुशियों के लिए जान से हारा कोई दोस्त,

कैसे जी पाएँगे इस शहर ए परेशाँ में जहाँ
कोई दुश्मन है हमारा न हमारा कोई दोस्त,

कुछ तो जीने के लिए हम को भी दे रब्ब ए करीम
साग़र ओ मीना किसी ग़म का सहारा कोई दोस्त,

रूठ जाए मेरी आँखों से भले बीनाई
काश रूठे न वसी आँख का तारा कोई दोस्त..!!

~वसी शाह

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