खाने को तो ज़हर भी खाया जा सकता है
खाने को तो ज़हर भी खाया जा सकता है लेकिन उस को फिर समझाया जा सकता है, इस
Shayari
खाने को तो ज़हर भी खाया जा सकता है लेकिन उस को फिर समझाया जा सकता है, इस
लोग कहते हैं कि इस खेल में सर जाते हैं इश्क़ में इतना ख़सारा है तो घर जाते
तेरी अंजुमन में ज़ालिम अजब एहतिमाम देखा कहीं ज़िंदगी की बारिश कहीं क़त्ल ए आम देखा, मेरी अर्ज़
हंगामा ए ग़म से तंग आ कर इज़हार ए मसर्रत कर बैठे मशहूर थी अपनी ज़िंदादिली दानिस्ता शरारत
जीने वाले क़ज़ा से डरते हैं ज़हर पी कर दवा से डरते हैं, ज़ाहिदों को किसी का ख़ौफ़
वो हम से दूर होते जा रहे हैं बहुत मग़रूर होते जा रहे हैं, बस एक तर्क ए
मेरी ज़िंदगी है ज़ालिम तेरे ग़म से आश्कारा तेरा ग़म है दर हक़ीक़त मुझे ज़िंदगी से प्यारा, वो
कोई आरज़ू नहीं है कोई मुद्दआ नहीं है तेरा ग़म रहे सलामत मेरे दिल में क्या नहीं है
ग़म ए इश्क़ रह गया है ग़म ए जुस्तुजू में ढल कर वो नज़र से छुप गए हैं
मेरी ज़िंदगी पे न मुस्कुरा मुझे ज़िंदगी का अलम नहीं जिसे तेरे ग़म से हो वास्ता वो ख़िज़ाँ