तख़्लीक़ पे फ़ितरत की गुज़रता है गुमाँ और
तख़्लीक़ पे फ़ितरत की गुज़रता है गुमाँ और इस आदम ए ख़ाकी ने बनाया है जहाँ और, ये
Sad Poetry
तख़्लीक़ पे फ़ितरत की गुज़रता है गुमाँ और इस आदम ए ख़ाकी ने बनाया है जहाँ और, ये
हालत ए हाल के सबब हालत ए हाल ही गई शौक़ में कुछ नहीं गया शौक़ की ज़िंदगी
तुम आए हो न शब ए इंतिज़ार गुज़री है तलाश में है सहर बार बार गुज़री है, जुनूँ
कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी, कब
नया एक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम ? बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम ? ख़मोशी से
बे क़रारी सी बे क़रारी है वस्ल है और फ़िराक़ तारी है, जो गुज़ारी न जा सकी हम
मेरे नसीब का लिखा बदल भी सकता था वो चाहता तो मेंरे साथ चल भी सकता था, ये
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल ए यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता, तेरे
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा, बेवक़्त अगर
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे,