चराग़ ख़ुद ही बुझाया बुझा के छोड़ दिया
चराग़ ख़ुद ही बुझाया बुझा के छोड़ दिया वो ग़ैर था उसे अपना बना के छोड़ दिया, हज़ार
Sad Poetry
चराग़ ख़ुद ही बुझाया बुझा के छोड़ दिया वो ग़ैर था उसे अपना बना के छोड़ दिया, हज़ार
कुटिया में कौन आएगा इस तीरगी के साथ अब ये किवाड़ बंद करो ख़ामोशी के साथ, साया है
बुरा बुरे के अलावा भला भी होता है हर आदमी में कोई दूसरा भी होता है, तुम अपने
गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया, एक इश्क़
अजल होती रहेगी इश्क़ कर के मुल्तवी कब तक मुक़द्दर में है या रब आरज़ू ए ख़ुदकुशी कब
जो हमारे सफ़र का क़िस्सा है वो तेरी रहगुज़र का क़िस्सा है, सुब्ह तक ख़त्म हो ही जाएगा
जवानी ज़िंदगानी है न तुम समझे न हम समझे ये एक ऐसी कहानी है न तुम समझे न
सादगी तो हमारी ज़रा देखिए एतिबार आप के वादे पर कर लिया बात तो सिर्फ़ एक रात की
बिछड़ के उन के हम इस एहतिमाल से भी गए बयान ए ग़म से गए अर्ज़ ए हाल
जज़्बात का ख़ामोश असर देख रहा हूँ बेचैन है दिल आँख को तर देख रहा हूँ, ख़ाकिस्तर ए