ज़माने में कहीं दिल को लगाना भी ज़रूरी था
ज़माने में कहीं दिल को लगाना भी ज़रूरी था ग़लत कुछ भी नहीं लेकिन छुपाना भी ज़रूरी था,
Sad Poetry
ज़माने में कहीं दिल को लगाना भी ज़रूरी था ग़लत कुछ भी नहीं लेकिन छुपाना भी ज़रूरी था,
ज़िक्र होता है उस परी वश का जब भी महफ़िल में बात होती है, उस की यादों की
ज़िंदगी भी अजब तमाशा है कभी आशा कभी निराशा है, जिस में करती हैं गुफ़्तुगू आँखें वो मोहब्बत
तड़प रहा है दिल ए बे क़रार आ जाओ बस एक बार ऐ जान ए बहार आ जाओ,
जब भी ख़ल्वत में मेरी शम्अ जली शाम के बाद दिल के दरवाज़े पे दस्तक सी हुई शाम
पोशीदा सब की आँख से दिल की किताब रख मुमकिन हो गर तो ज़ख़्म के बदले गुलाब रख,
मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना जहाँ दरिया मिले बे आब मेरा नाम लिख देना, ये
कभी ख़िरद से कभी दिल से दोस्ती कर ली न पूछ कैसे बसर हम ने ज़िंदगी कर ली,
बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो तअल्लुक़ की गिराँबारी में थोड़ी नर्मियाँ रख दो, भटक
ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ कि जैसे एक दीया हूँ और हवा