भुखमरी की ज़द में है या दार के साये में है

bhukmari kee zad me hai yaa daar ke saaye me hai

भुखमरी की ज़द में है या दार के साये में है अहले हिंदुस्तान अब तलवार के साये में

ज़िंदगी दुश्वार है उफ़! ये गिरानी देखिए

zindagi dushwaar hai uff ye giraani dekhiye

ज़िंदगी दुश्वार है उफ़! ये गिरानी देखिए और फिर नेताओं की शोला बयानी देखिए, भीख का लेकर कटोरा

कौन जात हो भाई ? दलित हैं साब !

kaun jaat ho bhai dalit hai saab

कौन जात हो भाई? “दलित हैं साब!” नहीं मतलब किसमें आते हो? आपकी गाली में आते हैं गंदी

उस रऊनत से वो जीते हैं कि मरना ही नहीं

us ranaut se wo jite hain ki marna hi nahin

उस रऊनत से वो जीते हैं कि मरना ही नहीं तख़्त पर बैठे हैं यूँ जैसे उतरना ही

ख़ूब आज़ादी ए सहाफ़त है

khoob aazadi e sahafat hai

ख़ूब आज़ादी ए सहाफ़त है नज़्म लिखने पे भी क़यामत है, दावा जम्हूरियत का है हर आन ये

वही हालात हैं फ़क़ीरों के

wahi haalaat hai fakiron ke

वही हालात हैं फ़क़ीरों के दिन फिरे हैं फ़क़त वज़ीरों के, अपना हल्क़ा है हल्क़ा ए ज़ंजीर और

वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम ए ज़र है ख़तरे में

watan ko kuch nahi khatra nizam e zar hai khatre me

वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम ए ज़र है ख़तरे में हक़ीक़त में जो रहज़न है वही रहबर

दिन को दिन रात को मैं रात न लिखने पाऊँ

din ko din raat ko main raat na likhne paaoon

दिन को दिन रात को मैं रात न लिखने पाऊँ उनकी कोशिश है कि हालात न लिखने पाऊँ,

किसी की ना सुनिए ख़ुद की सुनाते जाइए

kisi ki naa suniye khud ki sunaate jaaiye

किसी की ना सुनिए ख़ुद की सुनाते जाइए आप जो है ख़ुद वही सबको बनाते जाइए, मुर्दा ज़मीरो

क्या ? खज़ूर के पेड़ो में झुकाव आ गया

kya khazoor ke pedo me jhukaav aa gaya

क्या ? खज़ूर के पेड़ो में झुकाव आ गया ज़नाब ! लगता है शहर में चुनाव आ गया,