ख़ंजर की तरह बू ए समन तेज़ बहुत है

khanzar-kee-tarah-boo-e-saman-tej-bahut-hai

ख़ंजर की तरह बू ए समन तेज़ बहुत है मौसम की हवा अब के जुनूँ ख़ेज़ बहुत है,

इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए

is-baag-me-wo-sang-ke-qaabil-kaha-na-jaaye

इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए जब तक किसी समर को मिरा दिल कहा

अल्फाज़ के झूठे बंधन में

alfaaz ke jhuthe bandhan me

अल्फाज़ के झूठे बंधन में आगाज़ के गहरे परों में हर शख्स मुहब्बत करता है, हालाकिं मुहब्बत कुछ

आ निकल के मैदाँ में दो रुख़ी के ख़ाने से

aa nikal ke maidaan me do rukhi ke khaane se

आ निकल के मैदाँ में दो रुख़ी के ख़ाने से काम चल नहीं सकता अब किसी बहाने से,

कहीं बे ख़याल हो कर युंही छू लिया किसी ने

kahin be khyaal ho kar yunhi chhoo liya kisi ne

कहीं बे ख़याल हो कर युंही छू लिया किसी ने कई ख़्वाब देख डाले यहाँ मेरी बे ख़ुदी

डरा के मौज ओ तलातुम से हम नशीनों को

dara ke mauj o talatum se hum nasheenon ko

डरा के मौज ओ तलातुम से हम नशीनों को यही तो हैं जो डुबोया किए सफ़ीनों को, शराब

उठाए जा उन के सितम और जिए जा

uthaye jaa un ke sitam aur jiye jaa

उठाए जा उन के सितम और जिए जा यूँ ही मुस्कुराए जा आँसू पिए जा, यही है मोहब्बत

तक़दीर का शिकवा बे मअ’नी

taqdeer ka shikwa be maani

तक़दीर का शिकवा बे मअ’नी जीना ही तुझे मंज़ूर नहीं, आप अपना मुक़द्दर बन न सके इतना तो

निगाह ए साक़ी ए ना मेहरबाँ ये क्या जाने

nigaah e saaqee e na meharbaan ye kya jaane

निगाह ए साक़ी ए ना मेहरबाँ ये क्या जाने कि टूट जाते हैं ख़ुद दिल के साथ पैमाने,

गो रात मेरी सुब्ह की महरम तो नहीं है

go raat meri subah kee marham to nahi hai

गो रात मेरी सुब्ह की महरम तो नहीं है सूरज से तेरा रंग ए हिना कम तो नहीं