तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा
तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा तेरे सामने मेरा हाल है, तेरी एक निगाह की बात है मेरी ज़िंदगी
Majrooh Sultanpuri
तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा तेरे सामने मेरा हाल है, तेरी एक निगाह की बात है मेरी ज़िंदगी
आह ए जाँ सोज़ की महरूमी ए तासीर न देख हो ही जाएगी कोई जीने की तदबीर न
हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे बहारें हम को ढूँढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे, इसी
कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा, शाम
हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह, इस कू
यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं, हैं
जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम ए जाँ बनता गया सोज़ ए जानाँ दिल में सोज़ ए दीगराँ
अब अहल ए दर्द ये जीने का एहतिमाम करें उसे भुला के ग़म ए ज़िंदगी का नाम करें,
दुश्मन की दोस्ती है अब अहल ए वतन के साथ है अब ख़िज़ाँ चमन में नए पैरहन के
मुझ से कहा जिब्रील ए जुनूँ ने ये भी वहइ ए इलाही है मज़हब तो बस मज़हब ए