मिलने का भी आख़िर कोई इम्कान बनाते

milne ka bhi aakhir koi

मिलने का भी आख़िर कोई इम्कान बनाते मुश्किल थी अगर कोई तो आसान बनाते, रखते कहीं खिड़की कहीं

दिल दे कर संगदिल को…

dil de kar sangdil ko

दिल दे कर संगदिल को ज़िन्दगी दुश्वार नहीं करना यूँ हर किसी से अपने इश्क़ का इजहार नहीं

तक़दीर की ग़र्दिश क्या कम थी…

taqdeer ki gardish kya kam thi

तक़दीर की ग़र्दिश क्या कम थी उस पर ये क़यामत कर बैठे, बेताबी ए दिल जब हद से

तेरा लहजा तेरी पहचान मुबारक हो तुझे

tera lahja teri pahchan mubaraq ho tujhe

तेरा लहजा तेरी पहचान मुबारक हो तुझे तेरी वहशत तेरा हैजान मुबारक हो तुझे, मैं मोहब्बत का पुजारी

मुझे आरज़ू जिसकी है उसको ही ख़बर नहीं

mujhe aarzoo jiski hai

मुझे आरज़ू जिसकी है उसको ही ख़बर नहीं नज़रअंदाज़ कर दूँ ऐसी मेरी कोई नज़र नहीं, मना पाबंदियाँ

इस शहर में कहीं पे हमारा मकाँ भी हो

is shahar men kahi hamara bhi

इस शहर में कहीं पे हमारा मकाँ भी हो बाज़ार है तो हम पे कभी मेहरबाँ भी हो,

बसा तो लेते नया दिल में हम मकीं लेकिन

basa to lete naya dil men h

बसा तो लेते नया दिल में हम मकीं लेकिन मिला न आप से बढ़ कर कोई हसीं लेकिन,

मुख़्तसर बात, बात काफी है…

mukhtasar baat baat kaafi hai

मुख़्तसर बात, बात काफी है एक तेरा साथ, साथ काफी है, वो जो गुज़र जाए तेरे पहलू में

तअल्लुक़ तर्क करने से मोहब्बत कम…

taalluq tark karne se mohabbat

तअल्लुक़ तर्क करने से मोहब्बत कम नहीं होती भड़कती है ये आतिश दिन ब दिन मद्धम नहीं होती,

हक़ीक़तों में बदलता सराब चुभने लगा

haqiqaton me badalta sarab

हक़ीक़तों में बदलता सराब चुभने लगा जो बन सका न हक़ीक़त वो ख़्वाब चुभने लगा, सवाल सख़्त हमारा