ख़ुशबू गुलों में तारों में ताबिंदगी नहीं
ख़ुशबू गुलों में तारों में ताबिंदगी नहीं तुम बिन किसी भी शय में कोई दिलकशी नहीं, जब तुम
Love Poetry
ख़ुशबू गुलों में तारों में ताबिंदगी नहीं तुम बिन किसी भी शय में कोई दिलकशी नहीं, जब तुम
नज़रों का मोहब्बत भरा पैग़ाम बहुत है मजबूर ए वफ़ा के लिए इनआम बहुत है, कुछ बादा ओ
जब हम हुदूद ए दैर ओ हरम से गुज़र गए हर सम्त उन का जल्वा अयाँ था जिधर
मुश्किल में है जान बहुत जान है अब हैरान बहुत, उस पत्थर दिल इंसाँ पर होते रहे
अगर है मंज़ूर ये कि होवे हमारे सीने का दाग़ ठंडा तो आ लिपटिए गले से ऐ जाँ
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा वो जो मिल गया उसे याद
चाँद का ख़्वाब उजालों की नज़र लगता है तू जिधर हो के गुज़र जाए ख़बर लगता है, उस
शाम तक सुब्ह की नज़रों से उतर जाते हैं इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं,
दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता, पहुँचा है
वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता मगर इन एहतियातों से तअ’ल्लुक़ मर नहीं