खंज़र से करो बात न तलवार से पूछो
खंज़र से करो बात न तलवार से पूछो मैं क़त्ल हुआ कैसे मेरे यार से पूछो, फर्ज़ अपना
Life Status
खंज़र से करो बात न तलवार से पूछो मैं क़त्ल हुआ कैसे मेरे यार से पूछो, फर्ज़ अपना
ज़ख़्म का मरहम दर्द का अपने दरमाँ बेच के आए हैं हम लम्हों का सौदा कर के सदियाँ
धरती पर जब ख़ूँ बहता है बादल रोने लगता है देख के शहरों की वीरानी जंगल रोने लगता
नशात ए ग़म भी मिला रंज ए शाद मानी भी मगर वो लम्हे बहुत मुख़्तसर थे फ़ानी भी,
मशअल ए दर्द फिर एक बार जला ली जाए जश्न हो जाए ज़रा धूम मचा ली जाए, ख़ून
नहीं रोक सकोगे जिस्म की इन परवाजों को बड़ी भूल हुई जो छेड़ दिया कई साज़ों को, कोई
छोटी छोटी बातों पर परिवार बदलते देखे वक़्त ए ज़रूरत सब यार बदलते देखे, अब तो यकीन उठ
हादसों का शहर है संभल जाइए कौन कब किस डगर है संभल जाइए, नेक रस्ते पे चलते हुए
क्यूँ ज़मीं है आज प्यासी इस तरह ? हो रही नदियाँ सियासी इस तरह, जान की परवाह किसे
लगा जब अक्स ए अबरू देखने दिलदार पानी में बहम हर मौज से चलने लगी तलवार पानी में,