फ़राज़ ए इश्क़ तेरी इंतिहा नहीं हुए हम
फ़राज़ ए इश्क़ तेरी इंतिहा नहीं हुए हम किसी पे क़र्ज़ थे लेकिन अदा नहीं हुए हम, तेरी
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फ़राज़ ए इश्क़ तेरी इंतिहा नहीं हुए हम किसी पे क़र्ज़ थे लेकिन अदा नहीं हुए हम, तेरी
रिश्तों की दलदल से कैसे निकलेंगे हर साज़िश के पीछे अपने निकलेंगे, चाँद सितारे गोद में आ कर
थोड़ा सा माहौल बनाना होता है वर्ना किसी के साथ ज़माना होता है, सच्चा शेर सुनाने वाले ख़त्म
सफ़र से लौट जाना चाहता है परिंदा आशियाना चाहता है, कोई स्कूल की घंटी बजा दे ये बच्चा
अश्क पीने के लिए ख़ाक उड़ाने के लिए अब मेरे पास ख़ज़ाना है लुटाने के लिए, ऐसी दफ़अ
खाने को तो ज़हर भी खाया जा सकता है लेकिन उस को फिर समझाया जा सकता है, इस
लोग कहते हैं कि इस खेल में सर जाते हैं इश्क़ में इतना ख़सारा है तो घर जाते
तेरी अंजुमन में ज़ालिम अजब एहतिमाम देखा कहीं ज़िंदगी की बारिश कहीं क़त्ल ए आम देखा, मेरी अर्ज़
हंगामा ए ग़म से तंग आ कर इज़हार ए मसर्रत कर बैठे मशहूर थी अपनी ज़िंदादिली दानिस्ता शरारत
जीने वाले क़ज़ा से डरते हैं ज़हर पी कर दवा से डरते हैं, ज़ाहिदों को किसी का ख़ौफ़