एक शख़्स बा ज़मीर मेरा यार मुसहफ़ी

ek shaks baa zamir mera yaar mushafee

एक शख़्स बा ज़मीर मेरा यार मुसहफ़ी मेरी तरह वफ़ा का परस्तार मुसहफ़ी, रहता था कज कुलाह अमीरों

हर गाम पर थे शम्स ओ क़मर उस दयार में

har gaam par the shams o qamar us dayaar me

हर गाम पर थे शम्स ओ क़मर उस दयार में कितने हसीं थे शाम ओ सहर उस दयार

कैसे कहें कि याद ए यार रात जा चुकी बहुत

kaise kahe ki yaad e yaar raat jaa chuki bahut

कैसे कहें कि याद ए यार रात जा चुकी बहुत रात भी अपने साथ साथ आँसू बहा चुकी

दयार ए दाग़ ओ बेख़ुद शहर ए देहली छोड़ कर तुझ को

dayaar e daag o bekhud shahar e delhi chhod kar tujh ko

दयार ए दाग़ ओ बेख़ुद शहर ए देहली छोड़ कर तुझ को न था मा’लूम यूँ रोएगा दिल

ग़ालिब ओ यगाना से लोग भी थे जब तन्हा

gaalib o yagaan se log bhi the jab tanha

ग़ालिब ओ यगाना से लोग भी थे जब तन्हा हम से तय न होगी क्या मंज़िल ए अदब

सर ए मिंबर वो ख़्वाबों के महल तामीर करते हैं

sar e mimber wo khwabon ke mahal taamir karte hain

सर ए मिंबर वो ख़्वाबों के महल तामीर करते हैं इलाज ए ग़म नहीं करते फ़क़त तक़रीर करते

जहाँ हैं महबूस अब भी हम वो हरम सराएँ नहीं रहेंगी

jahan hai mahbus ab bhi hum wo haram saraayen nahi rahengi

जहाँ हैं महबूस अब भी हम वो हरम सराएँ नहीं रहेंगी लरज़ते होंटों पे अब हमारे फ़क़त दुआएँ

गुलशन की फ़ज़ा धुआँ धुआँ है

gulshan ki faza dhuaan dhuaan hai

गुलशन की फ़ज़ा धुआँ धुआँ है कहते हैं बहार का समाँ है, बिखरी हुई पत्तियाँ हैं गुल की

ये उजड़े बाग़ वीराने पुराने

ye ujde baag veerane puraane

ये उजड़े बाग़ वीराने पुराने सुनाते हैं कुछ अफ़्साने पुराने, एक आह ए सर्द बन कर रह गए

उस गली के लोगों को मुँह लगा के पछताए

us gali ke logo ko munh laga ke pachhtaye

उस गली के लोगों को मुँह लगा के पछताए एक दर्द की ख़ातिर कितने दर्द अपनाए, थक के