पुर्सिश ए ग़म का शुक्रिया क्या तुझे आगही नहीं
पुर्सिश ए ग़म का शुक्रिया क्या तुझे आगही नहीं तेरे बग़ैर ज़िंदगी दर्द है ज़िंदगी नहीं, देख के
Hindi Shayari
पुर्सिश ए ग़म का शुक्रिया क्या तुझे आगही नहीं तेरे बग़ैर ज़िंदगी दर्द है ज़िंदगी नहीं, देख के
यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे साथ चल मौज ए सबा हो जैसे, लोग यूँ देख
न सियो होंठ न ख़्वाबों में सदा दो हम को मस्लहत का ये तक़ाज़ा है भुला दो हम
मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा, गिरा दिया है तो साहिल पे
जो तेरे देखने से निकले हैं वो भी दिन क्या मज़े से निकले हैं, वो कहाँ नज़्र जाँ
फ़ज़ा में छाए हुए हैं उदास सन्नाटे हों जैसे ज़ुल्मत ए शब का लिबास सन्नाटे, तेरे ख़याल की
बरहना शाख़ों पे कब फ़ाख़ताएँ आती हैं मैं वो शजर हूँ कि जिस में बलाएँ आती हैं, ये
मेरी अना का असासा ज़रूर ख़ाक हुआ मगर ख़ुशी है कि तेरे हुज़ूर ख़ाक हुआ, मुझे बदन के
शजर तो कब का कट के गिर चुका है परिंदा शाख़ से लिपटा हुआ है, समुंदर साहिलों से
होंठों से लफ़्ज़ ज़ेहन से अफ़्कार छीन ले मुझ से मेरा वसीला ए इज़हार छीन ले, नस्लें तबाह