ज़माने में कहीं दिल को लगाना भी ज़रूरी था

zamane me kahin dil ko lagana bhi zaruri tha

ज़माने में कहीं दिल को लगाना भी ज़रूरी था ग़लत कुछ भी नहीं लेकिन छुपाना भी ज़रूरी था,

ज़िक्र होता है उस परी वश का

zikr hota hai us pari vash ka

ज़िक्र होता है उस परी वश का जब भी महफ़िल में बात होती है, उस की यादों की

ज़िंदगी भी अजब तमाशा है

zindagi bhi azab tamasha hai

ज़िंदगी भी अजब तमाशा है कभी आशा कभी निराशा है, जिस में करती हैं गुफ़्तुगू आँखें वो मोहब्बत

तड़प रहा है दिल ए बे क़रार आ जाओ

tadap raha hai dil e be qarar aa jaao

तड़प रहा है दिल ए बे क़रार आ जाओ बस एक बार ऐ जान ए बहार आ जाओ,

जब भी ख़ल्वत में मेरी शम्अ जली शाम के बाद

jab bhi khalwat me meri shama jali shaam ke baad

जब भी ख़ल्वत में मेरी शम्अ जली शाम के बाद दिल के दरवाज़े पे दस्तक सी हुई शाम

पोशीदा सब की आँख से दिल की किताब रख

poshida sab kee aankh se dil kee kitab rakh

पोशीदा सब की आँख से दिल की किताब रख मुमकिन हो गर तो ज़ख़्म के बदले गुलाब रख,

मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना

mujhe tum shohraton ke darmiyan gumnam likh dena

मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना जहाँ दरिया मिले बे आब मेरा नाम लिख देना, ये

कभी ख़िरद से कभी दिल से दोस्ती कर ली

kabhi khirad se kabhi dil se dosti kar lee

कभी ख़िरद से कभी दिल से दोस्ती कर ली न पूछ कैसे बसर हम ने ज़िंदगी कर ली,

बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो

bichhadte daamnon me phool kee kuch pattiyan rakh do

बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो तअल्लुक़ की गिराँबारी में थोड़ी नर्मियाँ रख दो, भटक

ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ

gurub e shaam hi se khud ko yun mahsus karta hoon

ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ कि जैसे एक दीया हूँ और हवा