ये किस रश्क ए मसीहा का मकाँ है
ये किस रश्क ए मसीहा का मकाँ है ज़मीं याँ की चहारुम आसमाँ है, ख़ुदा पिन्हाँ है आलम
Hindi Shayari
ये किस रश्क ए मसीहा का मकाँ है ज़मीं याँ की चहारुम आसमाँ है, ख़ुदा पिन्हाँ है आलम
वतन नसीब कहाँ अपनी क़िस्मतें होंगी जहाँ भी जाएँगे हम साथ हिजरतें होंगी, कभी तो साहिब ए दीवार
दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे फिर भी एक शख्स में क्या क्या नज़र
हिज़्र के मौसम में ये बारिश का बरसना कैसा ? एक सहरा में समन्दर का गुज़रना कैसा ?
ज़ुल्फ़, अँगड़ाई, तबस्सुम, चाँद, आईना, गुलाब भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इन सब का शबाब, पेट के
तीर पर तीर लगाओ तुम्हें डर किस का है सीना किस का है मेरी जान जिगर किस का
चाँद है ज़ेर ए क़दम सूरज खिलौना हो गया हाँ, मगर इस दौर में क़िरदार बौना हो गया,
क्यूँ पत्थर को दिल में बसाए बैठे हो ? वो अपना था ही नहीं जिसे अपना बनाए बैठे
धड़कन धड़कन यादों की बारात अकेला कमरा मैं और मेरे ज़ख़्मी एहसासात अकेला कमरा, गए दिनों की तस्वीरों
आज सीलिंग फैन से लटकी हुई है ये मुहब्बत किस कदर भटकी हुई है, गैरो के कंधो पर