पढ़िए सबक़ यही है वफ़ा की किताब का
पढ़िए सबक़ यही है वफ़ा की किताब का काँटे करा रहे हैं तआरुफ़ गुलाब का, कैसा ये इंतिशार
Ghazals
पढ़िए सबक़ यही है वफ़ा की किताब का काँटे करा रहे हैं तआरुफ़ गुलाब का, कैसा ये इंतिशार
उदासी आसमाँ है दिल मिरा कितना अकेला है परिंदा शाम के पुल पर बहुत ख़ामोश बैठा है, मैं
घर से निकले अगर हम बहक जाएँगे वो गुलाबी कटोरे छलक जाएँगे, हम ने अल्फ़ाज़ को आइना कर
दिल करे जब आप का मुझ को रुलाया कीजिए आप ग़म की ये दवा मेरे ख़ुदारा कीजिए, लुत्फ़
अपने लिए रहा कभी उस के रहा ख़िलाफ़ मेरा मिज़ाज सब के लिए एक सा ख़िलाफ़, ऐसे भी
देखे हैं दिल नशीन मनाज़िर हिजाब के होते हैं रंग सैंकड़ों पागल जो ख़्वाब के, ख़ुशबू जिसे समझते
चलिए मुश्किल है अगर जीना तो मर जाते हैं बोझ हम रूह पे अपनी हैं उतर जाते हैं,
जलता रहा मैं रात की तन्हाइयों के साथ और तुम रहे हो सुब्ह की रानाइयों के साथ, ऐ
दिल में बस जान सा मैं रहता हूँ ख़ुद में मेहमान सा मैं रहता हूँ, कितने आबाद दिल
उस से मिला तो दिल मेंरा सरशार हो गया और फिर बिछड़ के ख़ुद से ही बेज़ार हो