उठाए जा उन के सितम और जिए जा
उठाए जा उन के सितम और जिए जा यूँ ही मुस्कुराए जा आँसू पिए जा, यही है मोहब्बत
Ghazals
उठाए जा उन के सितम और जिए जा यूँ ही मुस्कुराए जा आँसू पिए जा, यही है मोहब्बत
तक़दीर का शिकवा बे मअ’नी जीना ही तुझे मंज़ूर नहीं, आप अपना मुक़द्दर बन न सके इतना तो
निगाह ए साक़ी ए ना मेहरबाँ ये क्या जाने कि टूट जाते हैं ख़ुद दिल के साथ पैमाने,
गो रात मेरी सुब्ह की महरम तो नहीं है सूरज से तेरा रंग ए हिना कम तो नहीं
सू ए मक़्तल कि पए सैर ए चमन जाते हैं अहल ए दिल जाम ब कफ़ सर ब
रहते थे कभी जिन के दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह, बैठे हैं उन्ही के
मुझ से कहा जिब्रील ए जुनूँ ने ये भी वहइ ए इलाही है मज़हब तो बस मज़हब ए
हमें शुऊर ए जुनूँ है कि जिस चमन में रहे निगाह बन के हसीनों की अंजुमन में रहे,
दुश्मन की दोस्ती है अब अहल ए वतन के साथ है अब ख़िज़ाँ चमन में नए पैरहन के
अब अहल ए दर्द ये जीने का एहतिमाम करें उसे भुला के ग़म ए ज़िंदगी का नाम करें,