ब नाम ए कूचा ए दिलदार गुल बरसे कि संग आए
ब नाम ए कूचा ए दिलदार गुल बरसे कि संग आए हँसा है चाक ए पैराहन न क्यूँ
General Poetry
ब नाम ए कूचा ए दिलदार गुल बरसे कि संग आए हँसा है चाक ए पैराहन न क्यूँ
सिसकियों हिचकियों आहों की फ़रावानी में उलझनें कितनी हैं इस इश्क़ की आसानी में, ये तेरे बालों का
दिल यार का तख़्त हुआ ही नहीं जीवन ख़ुश बख़्त हुआ ही नहीं, इसे तोड़ना भी तो नर्मी
कँवल जो वो कनार ए आबजू न हो किसी भी अप्सरा से गुफ़्तुगू न हो, क़ज़ा हुआ है
कहानियों ने ज़रा खींच कर बदन अपने हरम सरा से बुलाया हमें वतन अपने, खुले गले की क़मीसें
सब्ज़ हिकायत सुर्ख़ कहानी तेरे आँचल की मेहमानी, सहज सहज उस हुस्न का चलना उस पे अंधी शब
ख्याल था कि तुझे पा के ख़ुद को ढूँढेंगे तू मिल गया है तो ख़ुद अपनी ज़ात से
लहू में रंग ए सुख़न उस का भर के देखते हैं चराग़ बाम से जिस को उतर के
लहू रगों में सँभाला नहीं गया मुझ से किसी दिशा में उछाला नहीं गया मुझ से, सुडौल बाँहों
सर को आवाज़ से वहशत ही सही और वहशत में अज़िय्यत ही सही, ख़ाक ज़ादी तेरे उश्शाक़ बहुत