अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की
अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की कोई पहचान ही बाक़ी नहीं वीरानों की, अपनी पोशाक
General Poetry
अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की कोई पहचान ही बाक़ी नहीं वीरानों की, अपनी पोशाक
तख़्लीक़ पे फ़ितरत की गुज़रता है गुमाँ और इस आदम ए ख़ाकी ने बनाया है जहाँ और, ये
हालत ए हाल के सबब हालत ए हाल ही गई शौक़ में कुछ नहीं गया शौक़ की ज़िंदगी
तुम आए हो न शब ए इंतिज़ार गुज़री है तलाश में है सहर बार बार गुज़री है, जुनूँ
कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी, कब
नया एक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम ? बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम ? ख़मोशी से
बे क़रारी सी बे क़रारी है वस्ल है और फ़िराक़ तारी है, जो गुज़ारी न जा सकी हम
गुलाबी होंठों पे मुस्कराहट सजा के मिलते तो बात बनती, वो चाँद चेहरे से काली ज़ुल्फें हटा के
मेरे नसीब का लिखा बदल भी सकता था वो चाहता तो मेंरे साथ चल भी सकता था, ये
लोग कहते हैं ज़माने में मुहब्बत कम है ये अगर सच है तो इस में हकीक़त कम है,