बे सबब ही इधर उधर जाता
तुम नहीं होते तो बिखर जाता,
फूल की तरह तुम अगर खिलते
इत्र की तरह मैं बिखर जाता,
ख़्वाब देखे थे हर जगह हम ने
छोड़ कर शहर ये किधर जाता,
बात ये है कि ये जुदाई है
हादिसा होता तो गुज़र जाता,
फिर जुदा होना होता ना मुम्किन
जिस्म में जिस्म गर उतर जाता..!!
~आतिश इंदौरी
बहुत पेपर पे छपने हैं तो ठप्पा काट लेते हैं
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