कभी याद आऊँ तो पूछना ज़रा अपनी फ़ुर्सत ए शाम से…

कभी याद आऊँ तो

कभी याद आऊँ तो पूछना ज़रा अपनी फ़ुर्सत ए शाम से किसे इश्क़ था तेरी ज़ात से किसे

जान मेरी जान कोई और है बात मेरी मान कोई और है…

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जान मेरी जान कोई और है बात मेरी मान कोई और है, हो गया हूँ मैं किसी का

सुना है इस मुहब्बत में बहुत नुक़सान होता है…

सुना है इस मुहब्बत

सुना है इस मुहब्बत में बहुत नुक़सान होता है, महकता झूमता जीवन गमो के नाम होता है, सुना

वो जो दिल में तेरा मुक़ाम है

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वो जो दिल में तेरा मुक़ाम है किसी और को वो दिया नहीं, वो जो रिश्ता तुझसे है

तेरी आँखों के दरीचे से गुज़ारे जाते

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तेरी आँखों के दरीचे से गुज़ारे जाते तो मेरे ख़्वाब यूँ बे मौत न मारे जाते, एक रिवायत

बाग़ पा कर ख़फ़क़ानी ये डराता है मुझे…

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बाग़ पा कर ख़फ़क़ानी ये डराता है मुझे साया-ए-शाख़-ए-गुल अफ़ई नज़र आता है मुझे, जौहर-ए-तेग़ ब-सर-चश्म-ए-दीगर मालूम हूँ

क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना…

क़यामत है कि सुन लैला

क़यामत है कि सुन लैला का दश्त-ए-क़ैस में आना तअ’ज्जुब से वो बोला यूँ भी होता है ज़माने

तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो…

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तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो मुझ को भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो

नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं…

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नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं शब-ए-फ़िराक़ से रोज़-ए-जज़ा ज़ियाद नहीं, कोई कहे कि शब-ए-मह में

नहीं कि मुझको क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं…

नहीं कि मुझको क़यामत

नहीं कि मुझको क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं शब-ए-फ़िराक़ से रोज़-ए-जज़ा ज़ियाद नहीं, कोई कहे कि शब-ए-मह में क्या