बा वक़्त ए शाम सूरज से हुकुमत छीन लेता है

बा वक़्त ए शाम सूरज से हुकुमत छीन लेता है
सहर होते ही सितारों से क़यादत छीन लेता है,

क़रीने सीख लो उसकी ज़मीं पे चलने फिरने के
तकव्वुर करने वालों से वो क़ुव्वत छीन लेता है,

कुर्सी की बुलंदी पे यूँ मगरूर न हो तू ऐ नादां
वो चाहे तो फिरऔन से भी हुकुमत छीन लेता है,

हर एक दाने में उसके फैज़ की मो’जिज़ा नुमाई है
ना कद्रों के निवालो से वो लज्ज़त छीन लेता है,

बड़ी मुश्किल से मिलती है ये सिफ़त नेकनामी की
ज़रा सा बहक जाओ तो वो इज्ज़त छीन लेता है,

कभी कश्ती बचा लेता है समन्दर में भी तूफानों से
कभी साहिल पर तैराको से वो हिम्मत छीन लेता है,

उसके अद्ल पर क़ायम है पूरी तारीख़ ए इंसानी
अक्सर कमज़र्फों से वो ऐवान ए हुकुमत छीन लेता है,

सबक़ सीखो कुछ तारीख ए हिज़रत की कहानी से
गर वो चाहे तो आँख वालों से भी बसारत छीन लेता है..!!


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