वो एक लफ़्ज़ जो बेसदा जाएगा
वही मुद्दतों तक सुना जाएगा,
कोई है जो मेरे तआक़ुब में है
मुझे मेरा चेहरा दिखा जाएगा,
वो एक शख़्स जो दुश्मन ए जाँ सही
मगर फिर भी अपना कहा जाएगा,
जलेगी कोई मिशअल ए जाँ अभी
मगर फिर अंधेरा सा छा जाएगा,
नफ़ी ए जुरअत ए हक़ नुमाई सही
मगर कब किसी से कहा जाएगा,
यहाँ एक शजर मुंतज़िर सा भी है
अब आख़िर कहाँ तक चला जाएगा ?
मैं वो मिशअल ए नीम शब हूँ ‘अमीर’
जिसे कल का सूरज बुझा जाएगा..!!
~अमीर क़ज़लबाश
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