आया ही नहीं कोई बोझ अपना उठाने को
कब तक मैं छुपा रखता इस ख़्वाब ख़ज़ाने को ?
देखा नहीं रुख़ करते जिस तर्फ़ ज़माने को
जी चाहता है अक्सर उस सम्त ही जाने को,
ये शग़्ल ए ज़बानी भी बेसर्फ़ा नहीं आख़िर
सौ बात बनाता हूँ एक बात बनाने को,
इस कुंज ए तबीअत की मुमकिन है हवा बदले
झोंका कोई आ जाए पत्ते ही उड़ाने को,
राज़ी न हुआ मैं भी मानूस मनाज़िर पर
तैयार न था वो भी कुछ और दिखाने को,
जैसा कि समझते हो वैसा तो नहीं कुछ भी
ये सारा तमाशा है एक वहम मिटाने को..!!
~अहमद महफूज़
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