कल जिन्हें ज़िंदगी थी रास बहुत

कल जिन्हें ज़िंदगी थी रास बहुत
आज देखा उन्हें उदास बहुत,

रफ़्तगाँ का निशाँ नहीं मिलता
एक रही है ज़मीन घास बहुत,

क्यूँ न रोऊँ तेरी जुदाई में ?
दिन गुज़ारे हैं तेरे पास बहुत,

छाँव मिल जाए दामन ए गुल की
है ग़रीबी में ये लिबास बहुत,

वादी ए दिल में पाँव देख के रख
है यहाँ दर्द की उगास बहुत,

सूखे पत्तों को देख कर नासिर
याद आती है गुल की बास बहुत..!!

~नासिर काज़मी

सर में जब इश्क़ का सौदा न रहा

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1 thought on “कल जिन्हें ज़िंदगी थी रास बहुत”

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