जुनून ए दिल न सिर्फ़ इतना कि एक गुल पैरहन तक है
क़द ओ गेसू से अपना सिलसिला दार ओ रसन तक है,
मगर ऐ हम-क़फ़स कहती है शोरीदा सरी अपनी
ये रस्म ए क़ैद ओ ज़िंदाँ एक दीवार ए कुहन तक है,
कहाँ बच कर चली ऐ फ़स्ल ए गुल मुझ आबला पा से
मेरे क़दमों की गुलकारी बयाबाँ से चमन तक है,
मैं क्या क्या जुरआ ए ख़ूँ पी गया पैमाना ए दिल में
बला नोशी मेरी क्या एक मय ए साग़र शिकन तक है,
न आख़िर कह सका उस से मेरा हाल ए दिल ए सोज़ाँ
मह ए ताबाँ कि जो उस का शरीक ए अंजुमन तक है,
नवा है जावेदाँ मजरूह जिस में रूह ए साअत हो
कहा किस ने मेरा नग़्मा ज़माने के चलन तक है..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
आबला पा कोई गुज़रा था जो पिछले सन में
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