मेरे पीछे ये तो मुहाल है कि ज़माना गर्म ए सफ़र न हो
कि नहीं मेरा कोई नक़्श ए पा जो चिराग़ ए राहगुज़र न हो,
रुख़ ए तेग़ से जो न हो कभी सहर ऐसी कोई नहीं मेरी
नहीं ऐसी एक भी शाम जो तह ए ज़ुल्फ़ ए दार बसर न हो,
मेरे हाथ हैं तो लूँगा ख़ुद मैं अब अपना साक़ी ए मयकदा
ख़ुम ए ग़ैर से तो ख़ुदा करे लब ए जाम भी मेरा तर न हो,
मैं हज़ार शक्ल बदल चुका चमन ए जहाँ में सुन ऐ सबा
कि जो फूल है तेरे हाथ में ये मेरा ही लख़्त ए जिगर न हो,
जिन्हें सब समझते हैं मेहर ओ मह न हों सिर्फ़ चंद नुक़ूश ए पा
जिसे कहते हैं कुर्रा ए ज़मीं फ़क़त एक संग ए सफ़र न हो,
तेरे पा ज़मीं पे रुके रुके तेरा सर फ़लक पे झुका झुका
कोई तुझ से भी है अज़ीम तर यही वहम तुझ को मगर न हो,
शब ए ज़ुल्म नरग़ा ए राहज़न से पुकारता है कोई मुझे
मैं फ़राज़ ए दार से देख लूँ कहीं कारवान ए सहर न हो..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
जिस दम ये सुना है सुब्ह ए वतन महबूस फ़ज़ा ए ज़िंदाँ में
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