आख़िर ग़म ए जानाँ को ऐ दिल बढ़ कर ग़म ए दौराँ होना था
इस क़तरे को बनना था दरिया इस मौज को तूफ़ाँ होना था,
हर मोड़ पे मिल जाते हैं अभी फ़िरदौस ओ जिनाँ के शैदाई
तुझ को तो अभी कुछ और हसीं ऐ आलम ए इम्काँ होना था,
वो जिस के गुदाज़ ए मेहनत से पुर नूर शबिस्ताँ है तेरा
ऐ शोख़ उसी बाज़ू पे तेरी ज़ुल्फ़ों को परेशाँ होना था,
आती ही रही है गुलशन में अब के भी बहार आई है तो क्या
है यूँ कि क़फ़स के गोशों से एलान ए बहाराँ होना था,
आया है हमारे मुल्क में भी एक दौर ए ज़ुलेख़ाई यानी
अब वो ग़म ए ज़िंदाँन देते हैं जिन को ग़म ए ज़िंदाँ होना था,
अब खुल के कहूँगा हर ग़म ए दिल मजरूह नहीं वो वक़्त कि जब
अश्कों में सुनाना था मुझ को आहों में ग़ज़ल ख़्वाँ होना था..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
एक छोटा सा ख़्वाब था जो पूरा नहीं हुआ
Discover more from Hindi Gazals :: हिंदी ग़ज़लें - A Huge collection of Hindi/Urdu Ghazals :: हिंदी/उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


























1 thought on “आख़िर ग़म ए जानाँ को ऐ दिल बढ़ कर ग़म ए दौराँ होना था”