ये तुझ से आश्ना दुनिया से बेगाने कहाँ जाते
तेरे कूचे से उठते भी तो दीवाने कहाँ जाते,
क़फ़स में भी मुझे सय्याद के हाथों से मिलते हैं
मेरी तक़दीर के लिखे हुए दाने कहाँ जाते,
न छोड़ा ज़ब्त ने दामन नहीं तो तेरे सौदाई
हुजूम ए ग़म से घबरा कर ख़ुदा जाने कहाँ जाते,
मैं अपने आँसुओं को कैसे दामन में छुपा लेता
जो पलकों तक चले आए वो अफ़्साने कहाँ जाते,
तुम्हारे नाम से मंसूब हो जाते हैं दीवाने
ये अपने होश में होते तो पहचाने कहाँ जाते,
अगर कोई हरीम ए नाज़ के पर्दे उठा देता
तो फिर काबा कहाँ रहता सनम-ख़ाने कहाँ जाते,
नहीं था मुस्तहिक़ मख़मूर रिंदों के सिवा कोई
न होते हम तो फिर लबरेज़ पैमाने कहाँ जाते..!!
~मख़मूर देहलवी
जिस को इतना चाहा मैं ने जिस को ग़ज़ल में लिखा चाँद
Discover more from Hindi Gazals :: हिंदी ग़ज़लें - A Huge collection of Hindi/Urdu Ghazals :: हिंदी/उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


























1 thought on “ये तुझ से आश्ना दुनिया से बेगाने कहाँ जाते”