कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा,
शाम तन्हाई की है आएगी मंज़िल कैसे
जो मुझे राह दिखा दे वही तारा न रहा,
ऐ नज़ारो न हँसो मिल न सकूँगा तुम से
तुम मेरे हो न सके मैं भी तुम्हारा न रहा,
क्या बताऊँ मैं कहाँ यूँही चला जाता हूँ
जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा न रहा..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
हम हैं मता ए कूचा ओ बाज़ार की तरह
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