हर चौक पे भाषण हैं, हर मंच पे क़सम का शोर

हर चौक पे भाषण हैं, हर मंच पे क़सम का शोर
पर रोटी की कतार में आज भी वही हैरानी होगी,

तख़्त भी बदल जाएँगे चेहरे भी नए आ जाएँगे
सत्ता की फ़ितरत मगर सदियों से सियानी होगी,

क़ाग़ज़ पे सुनहरे ख़्वाब मगर ज़मीं पे धूल ही धूल
विकास की तस्वीर फिर से सिर्फ़ ज़ुबानी होगी,

आवाज़ जो उठेगी वो पहले ही कुचल दी जाएगी
ख़ामोशी यहाँ जनता की सबसे बड़ी कहानी होगी,

इंक़लाब के नारे हैं, पर डर की निगहबानी है
क़ानून की आँखों पर पट्टी सियासी मेहरबानी होगी,

अहल ए चमन पूछते हैं तो कहते हैं सब्र रखना होगा
ये जुमला भी हुकूमत की एक पुरानी निशानी होगी..!!

~नवाब ए हिन्द

फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए

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