हक़ीक़त का अगर अफ़्साना बन जाए तो क्या कीजे
गले मिल कर भी वो बेगाना बन जाए तो क्या कीजे ?
हमें सौ बार तर्क ए मयकशी मंज़ूर है लेकिन
नज़र उस की अगर मयख़ाना बन जाए तो क्या कीजे ?
नज़र आता है सज्दे में जो अक्सर शैख़ साहब को
वो जल्वा जल्वा ए जानाना बन जाए तो क्या कीजे ?
तेरे मिलने से जो मुझ को हमेशा मना करता है
अगर वो भी तेरा दीवाना बन जाए तो क्या कीजे ?
ख़ुदा का घर समझ रखा है अब तक हम ने जिस दिल को
गर इस में भी एक बुतख़ाना बन जाए तो क्या कीजे..??
~अज्ञात
ला पिला दे साक़िया पैमाना पैमाने के बा’द
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