न डगमगाए कभी हम वफ़ा के रस्ते में
चराग़ हम ने जलाए हवा के रस्ते में,
किसे लगाए गले और कहाँ कहाँ ठहरे
हज़ार ग़ुंचा ओ गुल हैं सबा के रस्ते में,
ख़ुदा का नाम कोई ले तो चौंक उठते हैं
मिले हैं हम को वो रहबर ख़ुदा के रस्ते में,
कहीं सलासिल ए तस्बीह और कहीं ज़ुन्नार
बिछे हैं दाम बहुत मुद्दआ के रस्ते में,
अभी वो मंज़िल ए फ़िक्र ओ नज़र नहीं आई
है आदमी अभी जुर्म ओ सज़ा के रस्ते में,
हैं आज भी वही दार ओ रसन वही ज़िंदाँ
हर एक निगाह ए रुमूज़ आश्ना के रस्ते में,
ये नफ़रतों की फ़सीलें जहालतों के हिसार
न रह सकेंगे हमारी सदा के रस्ते में,
मिटा सके न कोई सैल ए इंक़लाब जिन्हें
वो नक़्श छोड़े हैं हम ने वफ़ा के रस्ते में,
ज़माना एक सा जालिब सदा नहीं रहता
चलेंगे हम भी कभी सर उठा के रस्ते में..!!
~हबीब जालिब
ज़र्रे ही सही कोह से टकरा तो गए हम
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