हम ने जो दीप जलाए हैं तेरी गलियों में
अपने कुछ ख़्वाब सजाए हैं तेरी गलियों में,
जाने ये इश्क़ है या कोई करामत अपनी
चाँद ले कर चले आए हैं तेरी गलियों में,
तज़्किरा हो तेरी गलियों का तो डर जाता है
दिल ने वो ज़ख़्म उठाए हैं तेरी गलियों में,
इस लिए भी तेरी गलियों से हमें नफ़रत है
हम ने अरमान गँवाए हैं तेरी गलियों में,
क्यूँ हर एक चीज़ अधूरी सी हमें लगती है
जाने क्या छोड़ के आएँ हैं तेरी गलियों में..!!
~वसी शाह

























