शेर बनाना मेंरा ख़ुद को बनाना भी है
ये जो है अल्फ़ाज़ में मेरा ज़माना भी है,
तुझको है इस दश्त को शहर बनाने की धुन
देख इसी दश्त में तेरा दिवाना भी है,
सुब्ह के शोले के साथ ख़ुद को लगानी है आग
शाम के पानी के साथ ख़ुद को बुझाना भी है,
उस को तो मेरे सिवा और भी कितने हैं काम
सो उसे आना तो है फिर कहीं जाना भी है,
इश्क़ से बाज़ आए हम उससे चलो कह के आएँ
अब तो मुलाक़ात का एक बहाना भी है..!!
~फ़रहत एहसास

























